प्राचीन विद्या-केन्द्र के रूप में वैशाली की भूमिकाः विशेषकर बौद्ध एवं जैन धर्म के संदर्भ में
प्रीति कुमारी, यूजीसी नेट (जेआरएफ) शोध छात्रा, इतिहास विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना, बिहार
DOI: 10.64127/rnimj.2026v2i226004
DOI URL: https://doi.org/10.64127/rnimj.2026v2i226004
Published Date: 10 February 2025
Issue: Vol. 2 ★ Issue 1 ★ January-March 2026
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सारांश-:

वैशाली का इतिहास प्राचीन भारत की समृद्ध ज्ञान-परंपरा और धार्मिक-सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण अध्याय प्रस्तुत करता है। यह नगर न केवल एक प्राचीन गणराज्य के रूप में प्रसिद्ध था, बल्कि बौद्ध एवं जैन धर्म के प्रमुख विद्या-केन्द्र के रूप में भी प्रतिष्ठित रहा। वैशाली में स्थापित महाविहार, संघीय शिक्षण परंपराएँ और आचार्यों की विद्वत् परंपरा ने इसे शिक्षा, दर्शन और नैतिक जीवन-मूल्यों के प्रसार का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया। बौद्ध परंपरा में यहाँ विहारों, धर्माेपदेश और ध्यान-प्रणालियों के माध्यम से ज्ञान का विकास हुआ, जबकि जैन धर्म के आचार्यों ने अहिंसा, संयम और आत्म-शुद्धि पर आधारित शिक्षण पद्धति का विस्तार किया। वैशाली की सामाजिक-आर्थिक संरचना, व्यापारिक संपर्क और सांस्कृतिक विविधता ने इसकी विद्या-परंपरा को और अधिक समृद्ध किया। यहाँ के विद्वानों, ग्रंथ-परंपरा और शैक्षणिक विमर्श ने दार्शनिक और नैतिक चिंतन को नई दिशा प्रदान की। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो वैशाली ने दोनों धर्मों के बीच वैचारिक संवाद और सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ावा दिया। आधुनिक दृष्टिकोण से भी यह क्षेत्र प्राचीन भारतीय शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक समरसता के अध्ययन का महत्वपूर्ण आधार है। इस प्रकार, वैशाली का योगदान प्राचीन विद्या-केन्द्र के रूप में भारतीय ज्ञान-संस्कृति और धार्मिक शिक्षा के विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है।

मुख्य शब्द: वैशाली, विद्या-केन्द्र, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, नैतिक शिक्षा, प्राचीन शिक्षा।