जलवायु परिवर्तन और भूजल स्तर में गिरावटः भारत के भूगोल पर दीर्घकालिक प्रभाव
डॉ0 विकाश कुमार, पूर्व शोध छात्र, भूगोल विभाग, साबरमती विश्वविद्यालय, अहमदाबाद, गुजरात.
DOI: 10.64127/rnimj.2025v1i2001
DOI URL: https://doi.org/10.64127/rnimj.2025v1i2001
Published Date: 20 December 2025
Issue: Vol. 1 ★ Issue 1 ★ October - December 2025
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सारांश-:

जलवायु परिवर्तन और भूजल स्तर में गिरावट भारत के भूगोल एवं सामाजिक-आर्थिक संरचना पर दूरगामी प्रभाव डाल रहे हैं। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और सूखे की आवृत्ति में वृद्धि के कारण प्राकृतिक जलचक्र बाधित हुआ है, जिससे भूमिगत जल का पुनर्भरण घटता जा रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों का पिघलना और मैदानी क्षेत्रों में अत्यधिक जल-निकासी भूजल संकट को और गंभीर बना रहे हैं। कृषि, उद्योग और शहरी विकास में अनियंत्रित जल उपयोग ने जल स्तर गिरावट की गति को और तेज किया है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक स्थिरता पर पड़ा है। कई क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध न होने से फसल उत्पादन घटा है और सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ बढ़ी हैं। इसके अतिरिक्त भूजल के अत्यधिक दोहन से भू-आकृतिक संरचनाओं में अस्थिरता और भूमि धंसाव जैसी समस्याएँ उभर रही हैं। जलवायु परिवर्तन के इन प्रभावों से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन, जल-संरक्षण तकनीकों, भूमिगत जल पुनर्भरण और प्रभावी नीति-निर्माण की आवश्यकता है। आधुनिक एवं पारंपरिक जल प्रबंधन विधियों के समन्वित उपयोग, जन-जागरूकता और वैज्ञानिक योजना द्वारा ही जल-संसाधनों का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकता है। यदि समय रहते व्यापक कदम न उठाए गए, तो भारत की दीर्घकालिक जल-सुरक्षा और भौगोलिक स्थिरता गंभीर संकट का सामना कर सकती है।

मुख्य शब्द:जलवायु परिवर्तन, भूजल स्तर गिरावट, जल-संकट, पुनर्भरण, जल प्रबंधन, पारिस्थितिक स्थिरता ।